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भगत सिंह की वैचारिक विरासत।

भगत सिंह की वैचारिक विरासत -

भगत सिंह ने अपने समय के राष्ट्रीय आन्दोलन पर जो आलोचनात्मक टिपण्णी की थी अपने देश काल की जमीन पर खड़े होकर उन्होंने भविष्य की सम्भावनाओं के बारे में जो आकलन प्रस्तुत किया था , कांग्रेसी नेतृत्व का जो वर्ग विश्लेषण किया था , देश की मेहनतकश जनता के सामने छात्रो - युवाओं के सामने और सहयोद्धा क्रान्तिकारियो के सामने क्रान्ति की तैयारी और मार्ग की उन्होंने जो नई योजना प्रस्तुत की थी , उसका आज के स्न्कत्पूर्ण समय में बहुत अधिक महत्व है |
जब पूरा देश देशी - विदेशी पूँजी की निर्वाध लूटऔर निरंकुश वर्चस्व तले रौदा जा रहा है , जब श्रम और पूँजी के बीच ध्रुवीकरण ज्यादा से ज्यादा तीखा होता जा रहा है , जब साम्राजय्वाद के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष ( जिसकी भगत सिंह ने भविष्यवाणी की थी ) विश्व स्टार पर ज्यादा से ज्यादा अवश्यम्भावी बनना प्रतीत हो रहा है , जब कांग्रेस ही नही सभी संसदीय पार्टियों और नकली वामपंथियो का चेहरा और पूरी सत्ता का चरित्र एकदम नगा हो चुका है | भगतसिंह की आशंकाए एकदम सही साबित हो चुकी है और भारत की मेहनतकश जनता व क्रांतिकारी युवाओं को साम्राजय्वाद और देशी पूंजीवाद के विरुद्ध एक नई क्रान्ति की तैयारी के जटिल कार्य के नये सिरे से सन्नद्ध हो जाने का समय अ चुका है |
भगत सिंह के समय के भारत से आज का भारत काफी बदल चूका है | उत्पादन प्रणाली से लेकर राजनितिक व्यवस्था , सामाजिक सम्बन्ध और संस्कृति तक के स्टार पर चीजे काफी बदल गयी है \ साम्राज्यवादी शोषण -उत्पीडन आज भी मौजूद है , लेकिन प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन के दौर से आज इसका स्वरूप काफी बदला है | वर्ग संघर्ष विगत सर्वहारा क्रांतियो और राष्ट्रीय मुक्ति युद्दो के दबाव के चलते तथा अपने भीतर के आंतरिक दबावों के फलस्वरूप साम्राज्यवाद के तौर तरीको में काफी बदलाव आये है | गाँवों में भी बुजुर्वा भूमि सुधारों की क्रमिक प्रक्रिया ने भूमि सम्बन्धो को मुल्त: बदल दिया है और नये पूंजीवादी भूस्वामी तथा पूंजीवादी फार्मर बन चुके है | भूतपूर्व धनी काश्तकार आज गाँव के मेह्नात्क्शो और छोटे - मझोले किसानो के शोषक की भूमिका में है | मझोले किसानो की भूमिका दोहरी बन चुकी है तथा गाँव के गरीबो को लुटने में देशी -विदेशी वित्तीय एवं औध्योगिक पूँजी की प्रत्यक्ष भूमिका बन रही है | निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि भारत जैसी अगली कतारों के भुँत्पुर्व औपनिवेशिक देश आज पिछड़े पूंजीवादी देश बन चुके है | अब इन देशो के इतिहास के एजेंडे पर राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष नही बल्कि समाजवाद के लिए संघर्ष है |
लेकिन इन महत्वपूर्ण परिवर्तनों के वावजूद साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध अभी जारी है और जैसा कि फाँसी से तीन दिन पहले पंजाब के गवर्नर को फाँसी के बजाए गोली से उडाये जाने की मांग करते हुए लिखे गये अपने पात्र में भगत सिंह , राजगुरु , सुखदेव ने लिखा था : ''यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक की शकतीशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिको की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार जमाये रखेंगे | चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति , अंग्रेज शासक अथवा सर्वथा भारतीय ही हो | उन्होंने आपस में मिलकर एक लुट जारी कर राखी है | यदि शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी इस स्थित में कोई फरक नही पड़ता |'' इस पत्र के अनत में विश्वासपूर्वक यह घोषणा की गयी थी कि ''निकट भविष्य में यह युद्ध अंतिम रूप से लड़ा जाएगा और तब यह निर्णायक युद्ध होगा | साम्राजय्वाद व पूंजीवाद कुछ समय के मेहमान है | यहाँ भगत सिंह की इस प्रकार इतिहास दृष्टि से हमारा साक्षात्कार होता है जो राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को जनमुक्ति - संघर्ष की इतिहास यात्रा के दौरान बीच का एक पड़ाव मात्र मानती थी और साम्राजय्वाद - पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष को ही अंतिम निर्णायक संघर्ष मानती थी | भगत सिंह ने कई स्थानों पर इस बात पर बल दिया है कि इस निर्णायक विश्व ऐतिहासिक महासभा का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग ही कर सकता है और पूंजीवाद का एक मात्र विकल्प समाजवाद ही हो सकता है | आज विश्व स्टार पर पूँजी और श्रम श्कतियो एक नये निर्णायक ऐतिहासिक युद्द के लिए आमने - सामने लामबंद हो रही है | तो भारत के युवाओं और मेह्नात्क्शो के लिए साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के भविष्य के बारे में आकलन और भविष्यवाणी का विशेष महत्व हो जाता है |
भगत सिंह , भगवतीचरण वोहरा और हिदुस्तान शोसलिस्ट रिपब्लिक असोसिएशन (एच,एस आ .ए ) के ने अग्रणी क्रान्तिकारियो का दृष्टिकोण भारतीय पूंजीपति वर्ग के बारे में एकदम स्पष्ट था | कांग्रेस के नेतृत्व को इन्ही पूंजीपतियों , व्यापारियों का प्रतिनिधि मानते थे और उनकी स्पष्ट धारणा थी कि राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व यदि कांग्रेस के हाथो में रहा तो उसका अनत एक समझौता के रूप में होगा और इसीलिए वह यह स्पष्ट संदेश देते है कि क्रान्तिकारियो के लिए आजादी का मतलब सत्ता अपर बहुसंख्य मेहनतकश वर्ग का काबिज होना न की लार्ड रीडिंग और लार्ड इरविन की जगह पुरुषोतम दास , ठाकुरदास अथवा गोर अंग्रेजो की जगह काले अंग्रेज का स्तासिं हो जाना | उनकी स्पष्ट घोषणा थी की यदि देशी शोषक भी किसानो -मजदूरो का खून चूसते रहेंगे तो हमारी लड़ाई जारी रहेगी |

साभार --- सामयिक कारवाँ के जुलाई -- दिसम्बर अंक से
भगत सिंह की वैचारिक विरासत। Reviewed by Unknown on January 16, 2018 Rating: 5

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